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किसी भी उम्र में हो सकती है दिमाग और रीढ़ की हड्डी से जुड़ी बीमारी- जानकारी है जरूरी

By Priyambda Sahay

Reviewed by : Ujala Cygnus

April 16, 2026

दिमाग और रीढ़ की हड्डी से जुड़ी बीमारी सिर्फ़ बुज़ुर्गों को होती है, ऐसा नहीं है। आज की तेज़ रफ़्तार जिंदगी में यह सभी उम्र के लोगों को तेज़ी से प्रभावित कर रहा है। भारत में स्थिति विशेष रूप से चिंताजनक है। देश में स्ट्रोक (पक्षाघात) मृत्यु का दूसरा सबसे बड़ा कारण बनकर उभरा है विकसित देशों की तुलना में यहां लोगों को स्ट्रोक जैसी समस्या का सामना 15-20 साल पहले ही करना पड़ रहा है। यही नहीं 40-50 वर्ष के आयु वर्ग में इसके मामलों की संख्या लगातार बढ़ रही है।

सिरदर्द, पीठ दर्द, कमज़ोरी और संतुलन बिगड़ने जैसी समस्याएं भी अब आम होती जा रही हैं। ये अक्सर चुपके से शुरू होती हैं और अगर नज़रअंदाज़ की जाएं तो और भी बदतर हो जाती हैं। सुस्त जीवनशैली, स्क्रीन पर ज़्यादा समय बिताना, तनाव और बैठने-उठने का गलत तरीका भी इसमें मुख्य रुप से योगदान दे रहे हैं।

बीमारी के शुरुआती चेतावनी संकेतों को पहचानना और समय पर चिकित्सा सहायता लेना मरीजों के जीवन में एक महत्वपूर्ण बदलाव ला सकता है। साथ ही बीमारी से जुड़ी जटिलताओं को रोकने, ठीक होने की प्रक्रिया को बेहतर बनाने और जान बचाने में भी मदद मिल सकती है।

डॉ. कुंज बिहारी सारस्वत, वरिष्ठ न्यूरोसर्जन और न्यूरोसर्जरी विभाग प्रमुख उजाला सिग्नस रेनबो अस्पताल, आगरा, यहां दिमाग और रीढ़ की हड्डी के विकारों के कारण, लक्षण और उपचार, साथ ही न्यूरोसर्जरी में उन्नत तकनीक के उपयोग के बारे में विस्तार से बता रहे हैं।

दिमाग या रीढ़ की हड्डी की समस्याओं के शुरुआती लक्षण क्या हैं जिन्हें लोगों को नज़रअंदाज़ नहीं करना चाहिए

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लोगों को लगातार सिरदर्द, गर्दन या पीठ में तेज़ दर्द, हाथों या पैरों में सुन्नपन या झनझनाहट, अंगों में कमज़ोरी, संतुलन बिगड़ने की समस्या, बार-बार चक्कर आना, दौरे पड़ना, याददाश्त से जुड़ी समस्याएं, या बोलने-चलने में कठिनाई जैसे लक्षणों को कभी भी नज़रअंदाज़ नहीं करना चाहिए। रीढ़ की हड्डी की समस्याओं में, पीठ से लेकर पैर तक दर्द फैलना, लंबे समय तक खड़े रहने या चलने में कठिनाई होना, या मल -मूत्र त्याग पर नियंत्रण खो देना जैसे लक्षण चेतावनी के संकेत हो सकते हैं। इन लक्षणों को शुरुआती चरण में ही पहचान लेने से गंभीर जटिलताओं को रोका जा सकता है।

लक्षणों को नज़रअंदाज़ करने या सिर्फ़ दवाओं पर निर्भर रहने के बजाय

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किसी न्यूरोसर्जन से कब सलाह लेनी चाहिए

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जब लगातार सुन्नपन, कमज़ोरी, चलने में कठिनाई या शरीर के अंगों के तालमेल (coordination) में कमी जैसे लक्षण महसूस हों, तो किसी न्यूरोसर्जन से सलाह लेनी चाहिए। यदि ये लक्षण ठीक नहीं होते हैं, कई हफ़्तों तक बने रहते हैं, या आपके रोज़मर्रा के जीवन को प्रभावित करने लगते हैं, तो चिकित्सा जांच में बिल्कुल भी देरी नहीं करनी चाहिए। जल्दी पता चलना बहुत ज़रूरी है, क्योंकि कई न्यूरोलॉजिकल बीमारियों का इलाज तब ज़्यादा असरदार तरीके से किया जा सकता है जब उनका पता शुरुआती दौर में चल जाए। मरीज़ों के लिए मेरा संदेश सीधा-सा है—अपने शरीर से मिलने वाले चेतावनी भरे संकेतों को नज़रअंदाज़ न करें। जल्दी सलाह लेना और सही समय पर इलाज करवाना गंभीर जटिलताओं को रोकने में मदद कर सकता है और जीवन की गुणवत्ता में काफ़ी सुधार ला सकता है।

मिनिमली इनवेसिव और एडवांस्ड न्यूरोसर्जिकल तकनीकों जैसी आधुनिक तकनीकों ने मरीज़ों के नतीजों को कैसे बेहतर बनाया है

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मिनिमली इनवेसिव सर्जरी, एंडोस्कोपिक प्रक्रियाओं, न्यूरो नेविगेशन, रोबोटिक सहायता और एडवांस्ड माइक्रोस्कोप जैसी आधुनिक तकनीकों ने मरीज़ों के बीमारी से जुड़े नतीजों में काफ़ी सुधार किया है। ये तकनीकें सर्जनों को छोटे चीरे के ज़रिए प्रक्रियाएँ करने की सुविधा देती हैं, जिससे ऊतकों(tissues) को कम नुकसान पहुँचता है, खून कम बहता है और दर्द भी कम होता है। इसके परिणामस्वरूप, मरीज़ों को जल्दी ठीक होने का अनुभव होता है, अस्पताल में कम समय बिताना पड़ता है और वे अपनी रोज़मर्रा की गतिविधियों में जल्दी लौट पाते हैं। इन नवाचारों ने न्यूरोसर्जरी को ज़्यादा असरदार और मरीज़ों के लिए ज़्यादा सुविधाजनक बना दिया है।

बहुत से लोग ब्रेन सर्जरी से डरते हैं। आज के समय में न्यूरोलॉजिकल प्रक्रियाएँ कितनी सुरक्षित हैं

?

चिकित्सा तकनीक में हुई प्रगति, अत्यधिक प्रशिक्षित न्यूरोसर्जन और आधुनिक ऑपरेशन थिएटरों की बदौलत, आज न्यूरोसर्जरी पहले के मुकाबले कहीं ज़्यादा सुरक्षित और सटीक हो गई है। कई न्यूरोसर्जिकल प्रक्रियाओं की सफलता दर में सुधार हुआ है। एडवांस्ड इमेजिंग, न्यूरो नेविगेशन सिस्टम और इंट्राऑपरेटिव मॉनिटरिंग सर्जनों को ज़्यादा सटीकता और कम से कम जोखिम के साथ ऑपरेशन करने में सक्षम बनाते हैं। हालाँकि, हर सर्जरी में कुछ न कुछ जोखिम तो होता ही है। आधुनिक न्यूरोसर्जरी, लोगों की आम धारणा के मुकाबले कहीं ज़्यादा सुरक्षित है, और बहुत से मरीज़ पूरी तरह ठीक होकर अपनी सामान्य ज़िंदगी में लौट पाते हैं।

आजकल ब्रेन और स्पाइन से जुड़ी बीमारियाँ आम होती जा रही हैं। इस बढ़ोतरी का मुख्य कारण क्या हैं

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आज हम ब्रेन और स्पाइन से जुड़ी जो सबसे आम बीमारियाँ देखते हैं, उनमें हर्निएटेड डिस्क (जिसे स्लिप डिस्क भी कहा जाता है), साइटिका, स्पाइन से जुड़ी डीजेनेरेटिव बीमारियाँ, ब्रेन ट्यूमर, स्ट्रोक और सिर की चोटें शामिल हैं। इन बीमारियों में बढ़ोतरी का मुख्य कारण गतिहीन जीवनशैली (sedentary lifestyle), स्क्रीन के सामने ज़्यादा समय बिताना, बैठने का गलत तरीका, बढ़ता तनाव, बढ़ती उम्र और शारीरिक गतिविधियों की कमी है। इसके अलावा, सड़क दुर्घटनाएँ और खेल-कूद के दौरान लगने वाली चोटें भी स्पाइन और सिर की चोटों में काफ़ी यगदान देती हैं। हालांकि MRI और CT स्कैन जैसी बेहतर जाँच सुविधाओं की वजह से बीमारियों का पता चलने की दर में भी सुधार हुआ है, यही कारण है कि आज ज़्यादा से ज़्यादा मामलों का निदान हो पा रहा है।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (

FAQ)

मुझे न्यूरोसर्जन से सलाह कब लेनी चाहिए

?

आपको न्यूरोसर्जन से तब सलाह लेनी चाहिए, जब सुन्नपन, कमज़ोरी, शरीर के अंगों के तालमेल में दिक्कत या दर्द जैसे लक्षण हफ़्तों तक बने रहें या आपकी रोज़मर्रा की गतिविधियों पर असर डालने लगें। शुरुआती चिकित्सा जाँच सही समय पर बीमारी का पता लगाने और इलाज के बेहतर नतीजों में मदद मिलती है।

क्या दिमाग और रीढ़ की हड्डी की समस्याओं से बचा जा सकता है

?

कई समस्याओं से अच्छी मुद्रा (posture) बनाए रखकर, शारीरिक रूप से सक्रिय रहकर, स्क्रीन पर बिताया जाने वाला समय कम करके, तनाव को नियंत्रित करके और लक्षण दिखने पर सही समय पर डॉक्टरी सलाह लेकर बचा जा सकता है।

क्या आज दिमाग और रीढ़ की हड्डी की सर्जरी सुरक्षित हैं

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हाँ, आधुनिक न्यूरोसर्जरी, उन्नत तकनीक, बेहतर इमेजिंग और अत्यधिक कुशल विशेषज्ञों की वजह से अब कहीं ज़्यादा सुरक्षित है। मिनिमली इनवेसिव तकनीकों ने सफलता दर को बढ़ाया है और जोखिमों को काफी हद तक कम किया है।

आजकल दिमाग और रीढ़ की हड्डी से जुड़ी सबसे आम समस्याएं कौन सी हैं

?

कुछ सबसे आम समस्याओं में स्लिप डिस्क (हर्निएटेड डिस्क), साइटिका, रीढ़ की हड्डी से जुड़े विकार (degenerative spine disorders), ब्रेन ट्यूमर, स्ट्रोक और सिर की चोटें शामिल हैं।

आजकल दिमाग और रीढ़ की हड्डी से जुड़ी समस्याएं क्यों बढ़ रही हैं

?

दिमाग और रीढ़ की हड्डी से जुड़ी समस्याएं मुख्य रूप से सुस्त जीवनशैली, गलत मुद्रा और स्क्रीन पर ज़्यादा समय बिताने की वजह से बढ़ रही हैं। शारीरिक गतिविधि की कमी, उच्च तनाव स्तर और अस्वस्थ आदतें इस जोखिम को और बढ़ा देती हैं। इसके अलावा, बढ़ती उम्र, चोटें और बेहतर जांच उपकरणों की वजह से आज ऐसे ज़्यादा मामलों की पहचान हो पा रही है।

अगर आपके मन में दिमाग और रीढ़ की हड्डी से जुड़ी समस्याओं को लेकर कोई सवाल हैं, तो अपने नज़दीकी उजाला सिग्नस हॉस्पिटल में डॉक्टर से सलाह लें। आप हमारे स्वास्थ्य विशेषज्ञों से askadoctor@ujalacygnus.com  पर भी संपर्क कर सकते हैं या डॉ. कुंज बिहारी सारस्वत से अपॉइंटमेंट बुक करने के लिए यहाँ क्लिक करें।

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