
डॉक्टरों की राय में जानें आखिर माँ और बच्चे दोनों के लिए क्यों जरूरी है स्तनपान?
By Priyambda Sahay
Reviewed by : Ujala Cygnus
August 11, 2026
माँ का दूध शिशुओं के लिए पूर्ण आहार होता है। इसमें बच्चों के रोग प्रतिरोधी क्षमता बढ़ाने की क्षमता होती है। पोषक तत्वों से भरपूर माँ के दूध की तुलना गाय या पैकेट वाले दूध से नहीं की जा सकती है। यह बच्चों के लिए जीवन रक्षक होता है। किसी बच्चे के जीवन के शुरुआती घंटों में, माँ का दूध सिर्फ़ भोजन नहीं होता, बल्कि यह नवजात शिशु को मिलने वाली इम्युनिटी (रोग-प्रतिरोधक क्षमता) की पहली खुराक होती है, जो सीधे माँ के शरीर से बच्चे तक पहुँचती है।
नेशनल फ़ैमिली हेल्थ सर्वे (NFHS-5, 2019–21) के अनुसार, छह महीने से कम उम्र के केवल 63.7% भारतीय बच्चों को ही सिर्फ़ माँ का दूध पिलाया जाता है, और सिर्फ़ 41.8% बच्चों को जन्म के पहले घंटे के भीतर माँ का दूध मिल पाता है। जबकि बच्चों को इसकी सबसे ज़्यादा जरूरत होती है। इसलिए स्तनपान कराने से जुड़ी भ्रांतियों को हटाना जरूरी है।
उजाला सिग्नस सुपर स्पेशलिटी हॉस्पिटल, रेवाड़ी की प्रसूति व स्त्री रोग विशेषज्ञ डॉक्टर श्वेता शर्मा ने इस बारे में विस्तार से जानकारी दी है।
स्तनपान कराना क्यों जरूरी है?
स्तनपान माँ और बच्चे, दोनों के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। सबसे जरूरी बात यह है कि इससे माँ और बच्चे के बीच भावनात्मक जुड़ाव और बॉन्डिंग मजबूत होती है। स्तनपान से बच्चों के विकास के लिए आवश्यक पोषक तत्व मिलते हैं। साथ ही, माँ के दूध में मौजूद एंटीबॉडीज बच्चे की रोग प्रतिरोधक क्षमता को मजबूत करने और कई संक्रमणों से बचाने में मदद करती है। चिकित्सा क्षेत्र में यह देखा गया है कि जो बच्चे सिर्फ़ माँ का दूध पीते हैं, उनमें शुरुआती महीनों में दस्त या सांस की बीमारी के कारण अस्पताल में भर्ती होने की संभावना बहुत कम होती है। ऐसा इसलिए नहीं है कि माँ का दूध बस एक अच्छी चीज़ है, बल्कि इसलिए है क्योंकि जिस शरीर में अभी कोई सुरक्षा प्रणाली नहीं है, उसके लिए यह दूध सुरक्षा उपलब्ध कराता है।
क्या स्तनपान कराने से माँ को भी फायदा होता है? माँ और बच्चे के लिए इसके क्या फायदे हैं?
जी हाँ, माँ के दूध का असर सिर्फ़ बच्चे तक सीमित नहीं है। स्तनपान कराने से माँ को भी कई फायदे होते हैं। यह गर्भावस्था के दौरान बढ़े वजन को कम करने में मदद कर सकता है और माँ-बच्चे के बीच भावनात्मक जुड़ाव को मजबूत करता है। माताओं के लिए, स्तनपान कराने से ऑक्सीटोसिन हार्मोन निकलता है, जो गर्भाशय को वापस अपने सामान्य आकार में आने में मदद करता है और डिलीवरी के बाद होने वाले ब्लीडिंग को कम करता है। यह सिर्फ़ माँ-बच्चे के बीच जुड़ाव बढ़ाने वाला हार्मोन नहीं है, बल्कि डिलीवरी के बाद के घंटों और दिनों में एक वास्तविक शारीरिक सुरक्षा कवच का काम करता है। माना जाता है कि स्तनपान कराने से ब्रेस्ट या ओवेरियन कैंसर और टाइप 2 डायबिटीज के जोखिम भी कम हो जाते हैं।
बच्चे के लिए माँ का दूध संपूर्ण पोषण का महत्वपूर्ण स्रोत है। इससे बच्चे को आवश्यक पोषक तत्व मिलते हैं और उसकी रोग प्रतिरोधक क्षमता मजबूत होती है, जिससे उसे विभिन्न संक्रमणों से लड़ने में मदद मिलती है। इसीलिए हम सलाह देते हैं कि बच्चे को जन्म से छह महीने तक केवल माँ का दूध दिया जाए।
बच्चे के जन्म के बाद निकलने वाले पहले गाढ़े पीले दूध (कोलोस्ट्रम) का बच्चे के जीवन में क्या महत्व है?
बच्चे के जन्म के बाद बनने वाला पहला दूध, जिसे कोलोस्ट्रम कहा जाता है वह बच्चों के लिए किसी रोग प्रतिरोधी टीके से कम नहीं है। यह गाढ़ा, पीले रंग का और पौष्टिकता से भरपूर होता है। कोलोस्ट्रम, वह गाढ़ा, सुनहरे रंग का तरल पदार्थ जो सामान्य दूध आने से पहले निकलता है, उसमें माँ के इम्यून सिस्टम (रोग-प्रतिरोधक क्षमता) से सीधे आए एंटीबॉडीज़ की भरपूर मात्रा होती है। यह नवजात शिशु को ठीक उसी समय मिलता है जब उसके शरीर में अपनी कोई रोग-प्रतिरोधक क्षमता नहीं होती। यह उन्हें भविष्य में होने वाले किसी भी रोग से बचाता है।
नई माताओं को स्तनपान कराने में किन चुनौतियों का सामना करना पड़ता है? इससे जुड़े कौन-कौन से मिथक हैं?
नई माताओं के सामने कई तरह की चुनौतियाँ होती हैं। सबसे आम चिंता यह होती है कि बच्चा सही तरीके से दूध पी पा रहा है या नहीं और उसे पर्याप्त दूध मिल रहा है या नहीं।
कई बार बच्चे को सही तरीके से लैच (Latch) कराने में भी परेशानी होती है। ऐसी स्थिति में मां को सही स्तनपान तकनीक और बच्चे की सही पोजीशन के बारे में जानकारी और सहायता की जरूरत होती है। स्तनपान को लेकर कई तरह के मिथक भी समाज में प्रचलित हैं। इसलिए माताओं को किसी भी सलाह या धारणा पर भरोसा करने के बजाय डॉक्टर या लैक्टेशन विशेषज्ञ से सही जानकारी लेनी चाहिए।
स्तनपान कराने से जुड़े मिथक
शुरुआती पीला गाढ़ा दूध (कोलोस्ट्रम) बच्चे को नहीं देना चाहिए। सच्चाई: यह गलत है। कोलोस्ट्रम पोषक तत्वों और एंटीबॉडी से भरपूर होता है और नवजात के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। इसे फेंकना नहीं चाहिए।
माँ का दूध कम आ रहा है, इसलिए बच्चे को तुरंत फॉर्मूला मिल्क देना चाहिए। सच्चाई: शुरुआती दिनों में माँ के शरीर में दूध की मात्रा धीरे-धीरे बढ़ती है। सही लैच और बार-बार स्तनपान कराने से दूध बनने में मदद मिलती है। जरूरत पड़ने पर डॉक्टर या लैक्टेशन कंसल्टेंट की सलाह लेनी चाहिए।
पतला या पानी जैसा दिखने वाला दूध पौष्टिक नहीं होता। सच्चाई: माँ के दूध का स्वरूप समय के साथ और एक फीड के दौरान भी बदल सकता है। पानी जैसा दिखना यह साबित नहीं करता कि दूध पौष्टिक नहीं है।
माँ को सर्दी-जुकाम हो तो स्तनपान बंद कर देना चाहिए। सच्चाई: सामान्य सर्दी-जुकाम में आमतौर पर स्तनपान जारी रखा जा सकता है। हालांकि, कुछ संक्रमणों या दवाओं की स्थिति में डॉक्टर की सलाह जरूरी होती है।
स्तनपान कराने वाली माँ को हर तरह का भोजन छोड़ देना चाहिए। सच्चाई: आमतौर पर माँ को संतुलित और विविध आहार लेना चाहिए। बिना चिकित्सकीय कारण के कई खाद्य पदार्थों को पूरी तरह बंद करने की जरूरत नहीं होती।
बच्चे के रोने का मतलब है कि माँ का दूध पर्याप्त नहीं है। सच्चाई: बच्चा पेट में गैस होने या दूसरे कई कारणों से रो सकता है। केवल रोने के आधार पर यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि उसे पर्याप्त दूध नहीं मिल रहा।
छह महीने के बच्चे को पानी भी देना जरूरी है। सच्चाई: सामान्य परिस्थितियों में छह महीने तक केवल माँ का दूध बच्चे की पोषण और पानी की जरूरत पूरी कर सकता है। पूरक आहार आमतौर पर लगभग छह महीने की उम्र में शुरू किया जाता है।
कौन-सी महिलाएं अपने बच्चों को स्तनपान नहीं करा सकती हैं?
कुछ विशेष चिकित्सकीय परिस्थितियों में डॉक्टर स्तनपान न कराने की सलाह दे सकते हैं। ऐसी स्थिति में मां और बच्चे दोनों की स्वास्थ्य स्थिति का मूल्यांकन करना जरूरी होता है। उदाहरण के लिए, कुछ विशेष संक्रमणों या चिकित्सकीय स्थितियों में स्तनपान को लेकर सावधानी बरतनी पड़ सकती है। एचआईवी संक्रमण और हेपेटाइटिस बी जैसी कुछ परिस्थितियों में स्तनपान के संबंध में चिकित्सकीय सलाह आवश्यक होती है। इसलिए ऐसी स्थिति में मां को स्वयं निर्णय लेने के बजाय अपने डॉक्टर की सलाह का पालन करना चाहिए।
स्तनपान कराने वाली महिलाओं के लिए आपकी क्या जरूरी सलाह है?
स्तनपान कराने वाली माताओं को कुछ बातों का विशेष ध्यान रखना चाहिए:
पोषक तत्वों से भरपूर और संतुलित आहार लें।
बच्चे को नियमित रूप से स्तनपान कराएं।
जितना अधिक और प्रभावी ढंग से स्तनपान कराया जाता है, उतना ही दूध बनने की प्रक्रिया को बढ़ावा मिलता है।
व्यक्तिगत स्वच्छता का ध्यान रखें।
बच्चे को दूध पिलाते समय उसकी सही पोजीशन और लैच पर ध्यान दें।
बच्चे को स्तन से पर्याप्त समय तक दूध पीने दें ताकि उसे दूध के विभिन्न हिस्सों से मिलने वाला पोषण प्राप्त हो सके।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि यदि मां को दूध की मात्रा, बच्चे के लैच, बच्चे के वजन बढ़ने या स्तनपान से जुड़ी किसी अन्य समस्या को लेकर चिंता है, तो समय पर डॉक्टर या लैक्टेशन विशेषज्ञ की सलाह लेनी चाहिए।
स्तनपान केवल बच्चे का पोषण नहीं है, बल्कि यह उसके स्वस्थ विकास, रोग प्रतिरोधक क्षमता और माँ-बच्चे के भावनात्मक संबंध की मजबूत नींव भी रखता है।
बच्चों को स्तनपान कराने के संबंध में आपके पास भी कोई सवाल है या फिर कोई समस्या आ रही है तो आप नजदीकी उजाला सिग्नस अस्पताल में प्रसूति व स्त्री रोग विशेषज्ञ से संपर्क कर सकते हैं और अपॉइंटमेंट बुक करने के लिए यहाँ क्लिक कर सकते हैं। आप हमारे हेल्थ एक्सपर्ट्स से askadoctor@ujalacygnus.com पर भी संपर्क कर सकते हैं।
FAQ
स्तनपान कराने की सबसे आम चुनौतियाँ क्या है?
ब्रेस्टफीडिंग एक स्वाभाविक प्रक्रिया है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि यह हमेशा आसानी से हो जाती है। स्वाभाविक रूप से, कई नई माताओं के लिए ब्रेस्टफीडिंग के शुरुआती दिन शारीरिक और भावनात्मक रूप से बहुत मुश्किल भरे हो सकते हैं। हालांकि ब्रेस्टफीडिंग के फायदे सभी जानते हैं, लेकिन इस सफर में अक्सर कई अनचाही मुश्किलें आती हैं। लैचिंग और ब्रेस्ट में दर्द ब्रेस्टफीडिंग की सबसे आम चुनौतियों में से एक है। गलत पोजीशन की वजह से निप्पल में दर्द, दूध का सही तरह से न निकल पाना और बच्चे का चिड़चिड़ापन जैसी समस्याएं हो सकती हैं। लैक्टेशन कंसल्टेंट की मदद से लगातार होने वाले दर्द से बचा जा सकता है।
दूध कम बनने के क्या कारण होते हैं?
कई माताओं को दूध कम बनने की चिंता होती है। इसके कारणों में तनाव, हार्मोनल कारण और सेहत से जुड़ी समस्याएं शामिल हो सकती हैं। बार-बार दूध पिलाने या पंप करने (दिन में कम से कम 8-12 बार), सही खान-पान और पानी की सही मात्रा जैसे उपायों से दूध का उत्पादन बढ़ाया जा सकता है। किसी भी छिपी हुई समस्या का पता लगाने के लिए हेल्थकेयर प्रोवाइडर से सलाह लेना ज़रूरी है।
मानसिक स्वास्थ्य और ब्रेस्टफीडिंग का तनाव कैसे एक दूसरे से जुड़ा हुआ है?
डिलीवरी के बाद मानसिक स्वास्थ्य का ब्रेस्टफीडिंग के अनुभवों से गहरा संबंध होता है। थकान या एंग्जायटी (बेचैनी) का सामना कर रही माताओं को अगर दूध पिलाने में मुश्किल होती है, तो वे निराश हो सकती हैं। काउंसलिंग के ज़रिए ब्रेस्टफीडिंग के बारे में जागरूकता का माहौल बनाकर इस तनाव को कम किया जा सकता है। माताओं को याद रखना जरूरी है कि उनके लिए देखभाल, आराम और हल्की कसरत से थकान कम हो सकती है और ब्रेस्टफीडिंग को सफलतापूर्वक जारी रखा जा सकता है।
स्तनपान कराने में लैक्टेशन कंसल्टेंट की क्या भूमिका होती है?
एक लैक्टेशन कंसल्टेंट अक्सर माताओं को यह समझाने की कोशिश करती हैं वे पहले ही हफ़्ते में ब्रेस्टफीडिंग नहीं छोड़ें और आत्मविश्वास के साथ ब्रेस्टफीडिंग जारी रखे। ट्रेंड और सर्टिफाइड, खासकर इंटरनेशनल बोर्ड सर्टिफाइड लैक्टेशन कंसल्टेंट (IBCLC) के तौर पर, ये स्पेशलिस्ट ब्रेस्टफीडिंग के तौर-तरीकों और शरीर की कार्यप्रणाली पर खास ध्यान देते हैं, जिसके लिए आम तौर पर कोई जनरल नर्स या प्रसूति रोग विशेषज्ञ भी ट्रेंड नहीं होते हैं।
एक लैक्टेशन कंसल्टेंट बच्चे को दूध पीते हुए देखकर तुरंत पता लगा सकता है कि क्या गड़बड़ है- जैसे बच्चे की जीभ का जुड़ा होना (टंग-टाई) जिससे ठीक से लैचिंग नहीं हो पा रही है, गलत पोज़िशनिंग की वजह से ठीक से दूध न पी पाना, या दूध कम मिलने का कोई ऐसा बारीक संकेत जिसे पहली बार माँ बनी महिला खुद नहीं पहचान पाएगी। वे तुरंत समस्या को ठीक करते हैं। लैक्टेशन कंसल्टेंट माताओं को दूध की सप्लाई से जुड़ी चिंताओं को दूर करने, ब्रेस्टफीडिंग जारी रखते हुए काम पर लौटने की योजना बनाने, सुरक्षित पंपिंग और स्टोरेज का रूटीन बनाने, और दूध पिलाने में आने वाली मुश्किलों से जुड़े इमोशनल तनाव को संभालने में मदद करते हैं। लैक्टेशन कंसल्टेंट अक्सर वह स्पेशलिस्ट होते हैं जो समस्या को समय रहते पहचान लेते हैं ताकि वह और न बढ़े।
दूध पिलाने वाली माँ अपनी डाइट और हाइड्रेशन का ध्यान कैसे रखें?
आप जो खाती-पीती हैं, उसका सीधा असर आपकी एनर्जी, मूड और दूध बनने की मात्रा पर पड़ता है। पोषक तत्वों से भरपूर डाइट शरीर को ठीक होने में मदद करती है और दूध बनने की प्रक्रिया को बनाए रखती है। दिन में कम से कम 2-3 लीटर पानी व दूसरे तरल पदार्थ लें। इसके लिए पानी, हर्बल चाय, दूध और सूप अच्छे विकल्प हैं।
पोषक तत्वों से भरपूर खाना: साबुत अनाज, लीन प्रोटीन (जैसे अंडे, मछली, दालें), हेल्दी फैट (नट्स, बीज, एवोकाडो) और रंग-बिरंगे फल और सब्ज़ियाँ शामिल करें।
आयरन और कैल्शियम: डिलीवरी के बाद ये बहुत ज़रूरी हैं। इनके स्रोतों में हरी पत्तेदार सब्ज़ियाँ, डेयरी, टोफू, फलियाँ और फोर्टिफाइड अनाज शामिल हैं।
ओमेगा-3 फैटी एसिड: फैटी मछली, अलसी के बीज और अखरोट में पाए जाने वाले ये तत्व बच्चे के दिमाग के विकास में मदद करते हैं।
थोड़ी-थोड़ी देर में खाना और स्नैक्स लेने से दिन भर एनर्जी बनी रह सकती है। अगर आपको दूध बनने की मात्रा की चिंता है, तो कुछ माताओं को ओट्स, मेथी और सौंफ जैसी चीज़ों से मदद मिलती है, हालाँकि सप्लीमेंट आज़माने से पहले हेल्थकेयर प्रोवाइडर से सलाह लेना सबसे अच्छा है।
कई माताओं को चिंता होती है कि बार-बार दूध पिलाने का मतलब है कि उनके पास पर्याप्त दूध नहीं है। असल में, नवजात शिशु अक्सर 'क्लस्टर फीडिंग' के दौर से गुज़रते हैं, जिसमें वे कई घंटों तक हर 30–60 मिनट में दूध पीते हैं। यह व्यवहार दूध बनने की प्रक्रिया को बढ़ावा देता है और तेज़ी से बढ़ते बच्चों के लिए पूरी तरह से सामान्य है।
माँ का दूध शिशुओं के लिए पूर्ण आहार होता है। इसमें बच्चों के रोग प्रतिरोधी क्षमता बढ़ाने की क्षमता होती है। पोषक तत्वों से भरपूर माँ के दूध की तुलना गाय या पैकेट वाले दूध से नहीं की जा सकती है। यह बच्चों के लिए जीवन रक्षक होता है। किसी बच्चे के जीवन के शुरुआती घंटों में, माँ का दूध सिर्फ़ भोजन नहीं होता, बल्कि यह नवजात शिशु को मिलने वाली इम्युनिटी (रोग-प्रतिरोधक क्षमता) की पहली खुराक होती है, जो सीधे माँ के शरीर से बच्चे तक पहुँचती है।
नेशनल फ़ैमिली हेल्थ सर्वे (NFHS-5, 2019–21) के अनुसार, छह महीने से कम उम्र के केवल 63.7% भारतीय बच्चों को ही सिर्फ़ माँ का दूध पिलाया जाता है, और सिर्फ़ 41.8% बच्चों को जन्म के पहले घंटे के भीतर माँ का दूध मिल पाता है। जबकि बच्चों को इसकी सबसे ज़्यादा जरूरत होती है। इसलिए स्तनपान कराने से जुड़ी भ्रांतियों को हटाना जरूरी है।
उजाला सिग्नस सुपर स्पेशलिटी हॉस्पिटल, रेवाड़ी की प्रसूति व स्त्री रोग विशेषज्ञ डॉक्टर श्वेता शर्मा ने इस बारे में विस्तार से जानकारी दी है।
स्तनपान कराना क्यों जरूरी है?
स्तनपान माँ और बच्चे, दोनों के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। सबसे जरूरी बात यह है कि इससे माँ और बच्चे के बीच भावनात्मक जुड़ाव और बॉन्डिंग मजबूत होती है। स्तनपान से बच्चों के विकास के लिए आवश्यक पोषक तत्व मिलते हैं। साथ ही, माँ के दूध में मौजूद एंटीबॉडीज बच्चे की रोग प्रतिरोधक क्षमता को मजबूत करने और कई संक्रमणों से बचाने में मदद करती है। चिकित्सा क्षेत्र में यह देखा गया है कि जो बच्चे सिर्फ़ माँ का दूध पीते हैं, उनमें शुरुआती महीनों में दस्त या सांस की बीमारी के कारण अस्पताल में भर्ती होने की संभावना बहुत कम होती है। ऐसा इसलिए नहीं है कि माँ का दूध बस एक अच्छी चीज़ है, बल्कि इसलिए है क्योंकि जिस शरीर में अभी कोई सुरक्षा प्रणाली नहीं है, उसके लिए यह दूध सुरक्षा उपलब्ध कराता है।
क्या स्तनपान कराने से माँ को भी फायदा होता है? माँ और बच्चे के लिए इसके क्या फायदे हैं?
जी हाँ, माँ के दूध का असर सिर्फ़ बच्चे तक सीमित नहीं है। स्तनपान कराने से माँ को भी कई फायदे होते हैं। यह गर्भावस्था के दौरान बढ़े वजन को कम करने में मदद कर सकता है और माँ-बच्चे के बीच भावनात्मक जुड़ाव को मजबूत करता है। माताओं के लिए, स्तनपान कराने से ऑक्सीटोसिन हार्मोन निकलता है, जो गर्भाशय को वापस अपने सामान्य आकार में आने में मदद करता है और डिलीवरी के बाद होने वाले ब्लीडिंग को कम करता है। यह सिर्फ़ माँ-बच्चे के बीच जुड़ाव बढ़ाने वाला हार्मोन नहीं है, बल्कि डिलीवरी के बाद के घंटों और दिनों में एक वास्तविक शारीरिक सुरक्षा कवच का काम करता है। माना जाता है कि स्तनपान कराने से ब्रेस्ट या ओवेरियन कैंसर और टाइप 2 डायबिटीज के जोखिम भी कम हो जाते हैं।
बच्चे के लिए माँ का दूध संपूर्ण पोषण का महत्वपूर्ण स्रोत है। इससे बच्चे को आवश्यक पोषक तत्व मिलते हैं और उसकी रोग प्रतिरोधक क्षमता मजबूत होती है, जिससे उसे विभिन्न संक्रमणों से लड़ने में मदद मिलती है। इसीलिए हम सलाह देते हैं कि बच्चे को जन्म से छह महीने तक केवल माँ का दूध दिया जाए।
बच्चे के जन्म के बाद निकलने वाले पहले गाढ़े पीले दूध (कोलोस्ट्रम) का बच्चे के जीवन में क्या महत्व है?
बच्चे के जन्म के बाद बनने वाला पहला दूध, जिसे कोलोस्ट्रम कहा जाता है वह बच्चों के लिए किसी रोग प्रतिरोधी टीके से कम नहीं है। यह गाढ़ा, पीले रंग का और पौष्टिकता से भरपूर होता है। कोलोस्ट्रम, वह गाढ़ा, सुनहरे रंग का तरल पदार्थ जो सामान्य दूध आने से पहले निकलता है, उसमें माँ के इम्यून सिस्टम (रोग-प्रतिरोधक क्षमता) से सीधे आए एंटीबॉडीज़ की भरपूर मात्रा होती है। यह नवजात शिशु को ठीक उसी समय मिलता है जब उसके शरीर में अपनी कोई रोग-प्रतिरोधक क्षमता नहीं होती। यह उन्हें भविष्य में होने वाले किसी भी रोग से बचाता है।
नई माताओं को स्तनपान कराने में किन चुनौतियों का सामना करना पड़ता है? इससे जुड़े कौन-कौन से मिथक हैं?
नई माताओं के सामने कई तरह की चुनौतियाँ होती हैं। सबसे आम चिंता यह होती है कि बच्चा सही तरीके से दूध पी पा रहा है या नहीं और उसे पर्याप्त दूध मिल रहा है या नहीं।
कई बार बच्चे को सही तरीके से लैच (Latch) कराने में भी परेशानी होती है। ऐसी स्थिति में मां को सही स्तनपान तकनीक और बच्चे की सही पोजीशन के बारे में जानकारी और सहायता की जरूरत होती है। स्तनपान को लेकर कई तरह के मिथक भी समाज में प्रचलित हैं। इसलिए माताओं को किसी भी सलाह या धारणा पर भरोसा करने के बजाय डॉक्टर या लैक्टेशन विशेषज्ञ से सही जानकारी लेनी चाहिए।
स्तनपान कराने से जुड़े मिथक
शुरुआती पीला गाढ़ा दूध (कोलोस्ट्रम) बच्चे को नहीं देना चाहिए। सच्चाई: यह गलत है। कोलोस्ट्रम पोषक तत्वों और एंटीबॉडी से भरपूर होता है और नवजात के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। इसे फेंकना नहीं चाहिए।
माँ का दूध कम आ रहा है, इसलिए बच्चे को तुरंत फॉर्मूला मिल्क देना चाहिए। सच्चाई: शुरुआती दिनों में माँ के शरीर में दूध की मात्रा धीरे-धीरे बढ़ती है। सही लैच और बार-बार स्तनपान कराने से दूध बनने में मदद मिलती है। जरूरत पड़ने पर डॉक्टर या लैक्टेशन कंसल्टेंट की सलाह लेनी चाहिए।
पतला या पानी जैसा दिखने वाला दूध पौष्टिक नहीं होता। सच्चाई: माँ के दूध का स्वरूप समय के साथ और एक फीड के दौरान भी बदल सकता है। पानी जैसा दिखना यह साबित नहीं करता कि दूध पौष्टिक नहीं है।
माँ को सर्दी-जुकाम हो तो स्तनपान बंद कर देना चाहिए। सच्चाई: सामान्य सर्दी-जुकाम में आमतौर पर स्तनपान जारी रखा जा सकता है। हालांकि, कुछ संक्रमणों या दवाओं की स्थिति में डॉक्टर की सलाह जरूरी होती है।
स्तनपान कराने वाली माँ को हर तरह का भोजन छोड़ देना चाहिए। सच्चाई: आमतौर पर माँ को संतुलित और विविध आहार लेना चाहिए। बिना चिकित्सकीय कारण के कई खाद्य पदार्थों को पूरी तरह बंद करने की जरूरत नहीं होती।
बच्चे के रोने का मतलब है कि माँ का दूध पर्याप्त नहीं है। सच्चाई: बच्चा पेट में गैस होने या दूसरे कई कारणों से रो सकता है। केवल रोने के आधार पर यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि उसे पर्याप्त दूध नहीं मिल रहा।
छह महीने के बच्चे को पानी भी देना जरूरी है। सच्चाई: सामान्य परिस्थितियों में छह महीने तक केवल माँ का दूध बच्चे की पोषण और पानी की जरूरत पूरी कर सकता है। पूरक आहार आमतौर पर लगभग छह महीने की उम्र में शुरू किया जाता है।
कौन-सी महिलाएं अपने बच्चों को स्तनपान नहीं करा सकती हैं?
कुछ विशेष चिकित्सकीय परिस्थितियों में डॉक्टर स्तनपान न कराने की सलाह दे सकते हैं। ऐसी स्थिति में मां और बच्चे दोनों की स्वास्थ्य स्थिति का मूल्यांकन करना जरूरी होता है। उदाहरण के लिए, कुछ विशेष संक्रमणों या चिकित्सकीय स्थितियों में स्तनपान को लेकर सावधानी बरतनी पड़ सकती है। एचआईवी संक्रमण और हेपेटाइटिस बी जैसी कुछ परिस्थितियों में स्तनपान के संबंध में चिकित्सकीय सलाह आवश्यक होती है। इसलिए ऐसी स्थिति में मां को स्वयं निर्णय लेने के बजाय अपने डॉक्टर की सलाह का पालन करना चाहिए।
स्तनपान कराने वाली महिलाओं के लिए आपकी क्या जरूरी सलाह है?
स्तनपान कराने वाली माताओं को कुछ बातों का विशेष ध्यान रखना चाहिए:
पोषक तत्वों से भरपूर और संतुलित आहार लें।
बच्चे को नियमित रूप से स्तनपान कराएं।
जितना अधिक और प्रभावी ढंग से स्तनपान कराया जाता है, उतना ही दूध बनने की प्रक्रिया को बढ़ावा मिलता है।
व्यक्तिगत स्वच्छता का ध्यान रखें।
बच्चे को दूध पिलाते समय उसकी सही पोजीशन और लैच पर ध्यान दें।
बच्चे को स्तन से पर्याप्त समय तक दूध पीने दें ताकि उसे दूध के विभिन्न हिस्सों से मिलने वाला पोषण प्राप्त हो सके।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि यदि मां को दूध की मात्रा, बच्चे के लैच, बच्चे के वजन बढ़ने या स्तनपान से जुड़ी किसी अन्य समस्या को लेकर चिंता है, तो समय पर डॉक्टर या लैक्टेशन विशेषज्ञ की सलाह लेनी चाहिए।
स्तनपान केवल बच्चे का पोषण नहीं है, बल्कि यह उसके स्वस्थ विकास, रोग प्रतिरोधक क्षमता और माँ-बच्चे के भावनात्मक संबंध की मजबूत नींव भी रखता है।
बच्चों को स्तनपान कराने के संबंध में आपके पास भी कोई सवाल है या फिर कोई समस्या आ रही है तो आप नजदीकी उजाला सिग्नस अस्पताल में प्रसूति व स्त्री रोग विशेषज्ञ से संपर्क कर सकते हैं और अपॉइंटमेंट बुक करने के लिए यहाँ क्लिक कर सकते हैं। आप हमारे हेल्थ एक्सपर्ट्स से askadoctor@ujalacygnus.com पर भी संपर्क कर सकते हैं।
FAQ
स्तनपान कराने की सबसे आम चुनौतियाँ क्या है?
ब्रेस्टफीडिंग एक स्वाभाविक प्रक्रिया है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि यह हमेशा आसानी से हो जाती है। स्वाभाविक रूप से, कई नई माताओं के लिए ब्रेस्टफीडिंग के शुरुआती दिन शारीरिक और भावनात्मक रूप से बहुत मुश्किल भरे हो सकते हैं। हालांकि ब्रेस्टफीडिंग के फायदे सभी जानते हैं, लेकिन इस सफर में अक्सर कई अनचाही मुश्किलें आती हैं। लैचिंग और ब्रेस्ट में दर्द ब्रेस्टफीडिंग की सबसे आम चुनौतियों में से एक है। गलत पोजीशन की वजह से निप्पल में दर्द, दूध का सही तरह से न निकल पाना और बच्चे का चिड़चिड़ापन जैसी समस्याएं हो सकती हैं। लैक्टेशन कंसल्टेंट की मदद से लगातार होने वाले दर्द से बचा जा सकता है।
दूध कम बनने के क्या कारण होते हैं?
कई माताओं को दूध कम बनने की चिंता होती है। इसके कारणों में तनाव, हार्मोनल कारण और सेहत से जुड़ी समस्याएं शामिल हो सकती हैं। बार-बार दूध पिलाने या पंप करने (दिन में कम से कम 8-12 बार), सही खान-पान और पानी की सही मात्रा जैसे उपायों से दूध का उत्पादन बढ़ाया जा सकता है। किसी भी छिपी हुई समस्या का पता लगाने के लिए हेल्थकेयर प्रोवाइडर से सलाह लेना ज़रूरी है।
मानसिक स्वास्थ्य और ब्रेस्टफीडिंग का तनाव कैसे एक दूसरे से जुड़ा हुआ है?
डिलीवरी के बाद मानसिक स्वास्थ्य का ब्रेस्टफीडिंग के अनुभवों से गहरा संबंध होता है। थकान या एंग्जायटी (बेचैनी) का सामना कर रही माताओं को अगर दूध पिलाने में मुश्किल होती है, तो वे निराश हो सकती हैं। काउंसलिंग के ज़रिए ब्रेस्टफीडिंग के बारे में जागरूकता का माहौल बनाकर इस तनाव को कम किया जा सकता है। माताओं को याद रखना जरूरी है कि उनके लिए देखभाल, आराम और हल्की कसरत से थकान कम हो सकती है और ब्रेस्टफीडिंग को सफलतापूर्वक जारी रखा जा सकता है।
स्तनपान कराने में लैक्टेशन कंसल्टेंट की क्या भूमिका होती है?
एक लैक्टेशन कंसल्टेंट अक्सर माताओं को यह समझाने की कोशिश करती हैं वे पहले ही हफ़्ते में ब्रेस्टफीडिंग नहीं छोड़ें और आत्मविश्वास के साथ ब्रेस्टफीडिंग जारी रखे। ट्रेंड और सर्टिफाइड, खासकर इंटरनेशनल बोर्ड सर्टिफाइड लैक्टेशन कंसल्टेंट (IBCLC) के तौर पर, ये स्पेशलिस्ट ब्रेस्टफीडिंग के तौर-तरीकों और शरीर की कार्यप्रणाली पर खास ध्यान देते हैं, जिसके लिए आम तौर पर कोई जनरल नर्स या प्रसूति रोग विशेषज्ञ भी ट्रेंड नहीं होते हैं।
एक लैक्टेशन कंसल्टेंट बच्चे को दूध पीते हुए देखकर तुरंत पता लगा सकता है कि क्या गड़बड़ है- जैसे बच्चे की जीभ का जुड़ा होना (टंग-टाई) जिससे ठीक से लैचिंग नहीं हो पा रही है, गलत पोज़िशनिंग की वजह से ठीक से दूध न पी पाना, या दूध कम मिलने का कोई ऐसा बारीक संकेत जिसे पहली बार माँ बनी महिला खुद नहीं पहचान पाएगी। वे तुरंत समस्या को ठीक करते हैं। लैक्टेशन कंसल्टेंट माताओं को दूध की सप्लाई से जुड़ी चिंताओं को दूर करने, ब्रेस्टफीडिंग जारी रखते हुए काम पर लौटने की योजना बनाने, सुरक्षित पंपिंग और स्टोरेज का रूटीन बनाने, और दूध पिलाने में आने वाली मुश्किलों से जुड़े इमोशनल तनाव को संभालने में मदद करते हैं। लैक्टेशन कंसल्टेंट अक्सर वह स्पेशलिस्ट होते हैं जो समस्या को समय रहते पहचान लेते हैं ताकि वह और न बढ़े।
दूध पिलाने वाली माँ अपनी डाइट और हाइड्रेशन का ध्यान कैसे रखें?
आप जो खाती-पीती हैं, उसका सीधा असर आपकी एनर्जी, मूड और दूध बनने की मात्रा पर पड़ता है। पोषक तत्वों से भरपूर डाइट शरीर को ठीक होने में मदद करती है और दूध बनने की प्रक्रिया को बनाए रखती है। दिन में कम से कम 2-3 लीटर पानी व दूसरे तरल पदार्थ लें। इसके लिए पानी, हर्बल चाय, दूध और सूप अच्छे विकल्प हैं।
पोषक तत्वों से भरपूर खाना: साबुत अनाज, लीन प्रोटीन (जैसे अंडे, मछली, दालें), हेल्दी फैट (नट्स, बीज, एवोकाडो) और रंग-बिरंगे फल और सब्ज़ियाँ शामिल करें।
आयरन और कैल्शियम: डिलीवरी के बाद ये बहुत ज़रूरी हैं। इनके स्रोतों में हरी पत्तेदार सब्ज़ियाँ, डेयरी, टोफू, फलियाँ और फोर्टिफाइड अनाज शामिल हैं।
ओमेगा-3 फैटी एसिड: फैटी मछली, अलसी के बीज और अखरोट में पाए जाने वाले ये तत्व बच्चे के दिमाग के विकास में मदद करते हैं।
थोड़ी-थोड़ी देर में खाना और स्नैक्स लेने से दिन भर एनर्जी बनी रह सकती है। अगर आपको दूध बनने की मात्रा की चिंता है, तो कुछ माताओं को ओट्स, मेथी और सौंफ जैसी चीज़ों से मदद मिलती है, हालाँकि सप्लीमेंट आज़माने से पहले हेल्थकेयर प्रोवाइडर से सलाह लेना सबसे अच्छा है।
कई माताओं को चिंता होती है कि बार-बार दूध पिलाने का मतलब है कि उनके पास पर्याप्त दूध नहीं है। असल में, नवजात शिशु अक्सर 'क्लस्टर फीडिंग' के दौर से गुज़रते हैं, जिसमें वे कई घंटों तक हर 30–60 मिनट में दूध पीते हैं। यह व्यवहार दूध बनने की प्रक्रिया को बढ़ावा देता है और तेज़ी से बढ़ते बच्चों के लिए पूरी तरह से सामान्य है।
Explore Blogs
Loading...



















