ग्लूकोमा: आँखों की रोशनी का खामोश चोर, जानें लक्षण और इलाज

ग्लूकोमा को अक्सर “आँखों की रोशनी का खामोश चोर” कहा जाता है, क्योंकि अमूमन लोग अपनी आँखों की रोशनी का करीब 40% खोने के बाद भी यह समझ नहीं पाते कि उनकी आँखों में कोई गड़बड़ी आ रही है। ग्लूकोमा आमतौर पर एक दर्द-रहित स्थिति होती है, इसलिए लोग अक्सर अपनी आँखों में कोई बदलाव महसूस नहीं करते। जो कि बाद में आँखों की रोशनी खत्म होने का प्रमुख कारण बन जाती है। यह 60 साल से ज़्यादा उम्र के लोगों में अंधेपन के मुख्य कारणों में से एक है। क्योंकि आँखों की रोशनी धीरे-धीरे कम होती है, इसलिए बहुत से लोग इस समस्या से तब तक अनजान रहते हैं, जब तक कि आँखों को काफ़ी नुकसान नहीं हो जाता।

मेडिकल भाषा में, ग्लूकोमा आँखों की बीमारियों का एक समूह है जो ऑप्टिक नर्व (नज़र की नस) को नुकसान पहुँचाता है, जो अच्छी नज़र के लिए बहुत ज़रूरी है। यह आमतौर पर तब होता है जब आँख के अगले हिस्से में तरल पदार्थ जमा हो जाता है, जिससे आँख के अंदर का दबाव बढ़ जाता है। अगर इसका इलाज न किया जाए, तो यह दबाव धीरे-धीरे ऑप्टिक नर्व को नुकसान पहुँचा सकता है और आँखों की रोशनी कम होने का कारण बन सकता है।

कुछ रिपोर्ट इस ओर इशारा करते हैं कि दुनिया भर में लगभग 8 करोड़ लोग ग्लूकोमा से प्रभावित हैं। भारत में, लगभग 1 करोड़ 20 लाख लोग इस बीमारी के साथ जी रहे हैं, और कई अन्य विकासशील देशों की तरह, यहाँ भी लगभग 50–80% मामलों का पता ही नहीं चल पाता।

ग्लूकोमा के दो मुख्य प्रकार हैं: ओपन-एंगल ग्लूकोमा और एंगल-क्लोज़र ग्लूकोमा। आँखों के डॉक्टर कॉर्निया और आइरिस के बीच के कोण की जाँच करते हैं और पता लगाते हैं कि यह ओपन-एंगल ग्लूकोमा है या एंगल-क्लोज़र ग्लूकोमा। हालाँकि, इन दोनों ही स्थितियों की एक ही खासियत होती है कि ये आँख के तरल पदार्थ को उस कोण पर मौजूद ऊतक (tissue) के ज़रिए बाहर निकलने से रोकती हैं, जहाँ आइरिस और कॉर्निया मिलते हैं। क्योंकि तरल पदार्थ अपनी सामान्य गति से बाहर नहीं निकल पाता, इसलिए आँखों के अंदर का दबाव बढ़ जाता है और ऑप्टिक नर्व को नुकसान पहुँचाता है।

इसी संदर्भ में, उजाला सिग्नस – उजाला हॉस्पिटल के आँखों के डॉक्टर, डॉ. संयम मल्होत्रा ने ग्लूकोमा से जुड़े कई ज़रूरी सवालों के जवाब दिए हैं और इसे विस्तार से समझाया भी है।

ग्लूकोमा आँखों को कैसे प्रभावित करता है ?

ग्लूकोमा बीमारियों का एक ऐसा समूह है जिसकी पहचान आँखों के अंदर के दबाव (intraocular pressure) के असामान्य रूप से ज़्यादा होने से होती है। यह अत्याधिक दबाव ऑप्टिक नर्व को नुकसान पहुँचाता है। अगर इसका इलाज न किया जाए, तो इस नुकसान के कारण नज़र धीरे-धीरे और हमेशा के लिए कम होती जाती है, जिसका नतीजा आखिरकार अंधेपन के रूप में सामने आ सकता है।

क्या ग्लूकोमा का कोई इलाज है? मैं ग्लूकोमा का इलाज कैसे करवा सकता हूँ ?

नहीं, ग्लूकोमा का कोई पक्का इलाज नहीं है। ग्लूकोमा के इलाज का मुख्य मकसद नज़र कम होने की प्रक्रिया को धीमा करना होता है। इसके लिए, हमारे पास कई तरह के आई ड्रॉप्स और लेज़र उपलब्ध हैं, जो आँखों के अंदर के दबाव (intraocular pressure) को असरदार तरीके से कंट्रोल करने में हमारी मदद करते हैं। आखिरी कदम हमेशा सर्जरी और ग्लूकोमा-ड्रेनेज डिवाइस होते हैं।

ग्लूकोमा को नियंत्रित करने के उपायों में शामिल हैं:

आई ड्रॉप्स: इनका इस्तेमाल आँखों के अंदर के दबाव को असरदार तरीके से कंट्रोल करने के लिए किया जाता है।

लेज़र: इनका इस्तेमाल भी आँखों के अंदर के दबाव को असरदार तरीके से कंट्रोल करने के लिए किया जाता है।

सर्जरी: इसे आम तौर पर इलाज का आखिरी कदम माना जाता है।

ग्लूकोमा ड्रेनेज डिवाइस: यह सर्जरी का एक और विकल्प है, जो आम तौर पर गंभीर मामलों के लिए रखा जाता है।

ग्लूकोमा किन्हें हो सकता है ?

ग्लूकोमा किसी को भी हो सकता है, लेकिन कुछ लोगों के ग्रुप ऐसे हैं जिन्हें यह बीमारी होने का ज़्यादा खतरा होता है। पहला पैमाना 40 साल से ज़्यादा की उम्र है। मरीज़ों का दूसरा ग्रुप वह है जिनके परिवार में पहले किसी को ग्लूकोमा हुआ हो। डायबिटीज़ और हाई ब्लड प्रेशर (hypertension) के मरीज़ों को भी ग्लूकोमा होने का ज़्यादा खतरा होता है। लंबे समय तक स्टेरॉयड लेने वाले और जिन्हें बहुत ज़्यादा मायोपिया (नज़दीकी नज़र कमज़ोर होना) है, उन्हें भी ग्लूकोमा होने का खतरा ज़्यादा होता है।

क्या हम ग्लूकोमा के साथ भी आम ज़िंदगी जी सकते हैं ?

हाँ, वैसे मरीज जो कि ग्लूकोमा की जानकारी के लिए नियमित रूप से आँखों की जाँच करवाते हैं, और बीमारी का पता चलने के बाद आई ड्रॉप्स का सही तरीके से इस्तेमाल करते हैं, नियमित रूप से आँखों के डॉक्टर से जाँच करवाते हैं, डॉक्टर की सलाह मानते हैं, सेहतमंद जीवनशैली अपनाते हैं, और डायबिटीज़ व हाई ब्लड प्रेशर जैसी अपनी दूसरी बीमारियों को कंट्रोल में रखते हैं, वे ग्लूकोमा के साथ भी आम ज़िंदगी जी सकते हैं।

क्या ग्लूकोमा से बचा जा सकता है ?

ग्लूकोमा से पूरी तरह बचा तो नहीं जा सकता, लेकिन इस बीमारी की वजह से होने वाली आँखों की रोशनी में कमी का पता जल्दी लगाया जा सकता है। इसलिए, मरीज़ों को नियमित रूप से आँखों की जाँच और ग्लूकोमा की स्क्रीनिंग करवानी चाहिए। खतरे को कम करने और उसे कंट्रोल में रखने के लिए, मरीज़ों को ये बातें भी ध्यान में रखनी चाहिए:

अपनी डायबिटीज़ और हाई ब्लड प्रेशर को लगातार कंट्रोल में रखें।

बिना ज़रूरत स्टेरॉयड का इस्तेमाल न करें।

अपनी आँखों को चोट से बचाकर रखें।

अगर किसी मरीज़ के परिवार में पहले किसी को ग्लूकोमा हुआ हो, तो उन्हें खास तौर पर इस बीमारी के लिए नियमित रूप से आँखों की जाँच करवानी चाहिए।

अगर आपके मन में ग्लूकोमा से जुड़े कोई सवाल हैं, तो अपने नज़दीकी उजाला सिग्नस हॉस्पिटल ( में डॉक्टर से सलाह लें, या हमारे हेल्थ एक्सपर्ट्स से जुड़ने के लिए askadoctor@ujalacygnus.com पर ईमेल करें। डॉ. संयम मल्होत्रा से अपॉइंटमेंट बुक करने के लिए यहाँ क्लिक करें।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)

लोगों को कितनी बार ग्लूकोमा के लिए अपनी आँखों की जाँच करवानी चाहिए?

40 साल से ज़्यादा उम्र के लोगों को हर 1-2 साल में नियमित रूप से आँखों की जाँच करवानी चाहिए। जिन लोगों में बीमारी का खतरा ज़्यादा है, उन्हें आँखों के डॉक्टर की सलाह के अनुसार ज़्यादा बार स्क्रीनिंग करवाने की ज़रूरत पड़ सकती है। लोगों को किन शुरुआती चेतावनी संकेतों पर ध्यान देना चाहिए?

ग्लूकोमा के शुरुआती चेतावनी संकेत अक्सर बहुत हल्के होते हैं, इसीलिए इस बीमारी को “नज़र का खामोश चोर” कहा जाता है। इसके आम चेतावनी संकेत हैं- धीरे-धीरे किनारे की (पेरिफेरल) नज़र कम होना, धुंधला या अस्पष्ट दिखना, रोशनी के चारों ओर घेरे या इंद्रधनुषी रंग के छल्ले दिखना, आँखों में दर्द या दबाव महसूस होना (यह एक्यूट ग्लूकोमा में आम है), आँखों में लालिमा, और गंभीर मामलों में सिरदर्द या जी मिचलाना।

क्या ग्लूकोमा सिर्फ़ बुज़ुर्गों को होता है, या कम उम्र के लोगों को भी हो सकता है?

ग्लूकोमा बुज़ुर्गों में नजर की आम समस्या है। हालांकि 40 साल से ज़्यादा उम्र के लोगों में इसके लक्षण दिखने शुरू हो जाते हैं, लेकिन यह कम उम्र के लोगों और यहाँ तक कि बच्चों को भी हो सकता है।

ग्लूकोमा के लिए लेज़र थेरेपी और सर्जरी जैसे आधुनिक इलाज कितने असरदार हैं?

लेज़र थेरेपी और सर्जरी जैसे आधुनिक इलाजों ने ग्लूकोमा के इलाज को काफ़ी बेहतर बनाया है और आम तौर पर ये बीमारी को कंट्रोल करने में बहुत असरदार होते हैं।

कौन सी जीवनशैली की आदतें आँखों की सेहत बचाने और ग्लूकोमा का खतरा कम करने में मदद कर सकती हैं?

आँखों की नियमित जाँच सबसे ज़रूरी कदम है, खासकर 40 साल से ज़्यादा उम्र के लोगों या जिनके परिवार में ग्लूकोमा का इतिहास रहा हो। बीमारी का जल्दी पता चलने से आँखों की रोशनी को गंभीर नुकसान से बचाया जा सकता है। एक सेहतमंद जीवनशैली बनाए रखना भी इसमें अहम भूमिका निभाता है। इसमें हरी पत्तेदार सब्ज़ियाँ, फल और एंटीऑक्सीडेंट से भरपूर संतुलित आहार लेना शामिल है, जो आँखों की सेहत को बढ़ावा देते हैं। नियमित शारीरिक व्यायाम से रक्त संचार बेहतर होता है और आँखों के दबाव को नियंत्रित करने में मदद मिल सकती है। लोगों को डायबिटीज़ और हाई ब्लड प्रेशर जैसी पुरानी बीमारियों को भी नियंत्रित रखना चाहिए, क्योंकि इनसे आँखों की बीमारियों का खतरा बढ़ सकता है। धूम्रपान से बचना और शराब का अत्यधिक सेवन सीमित करना भी आँखों की सेहत के लिए फायदेमंद है।

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