बच्चों की बुद्धिमत्ता (IQ) को भी निगल रहा है वायु प्रदूषण

भारत में वायु प्रदूषण एक गंभीर स्वास्थ्य समस्या बन चुका है। अब तक इसे सांस, फेफड़े और हृदय रोगों से जोड़कर देखा जाता रहा है, लेकिन मेडिकल शोध यह संकेत दे रहे हैं कि वायु प्रदूषण बच्चों के मानसिक विकास और आईक्यू (Intelligence Quotient) स्तर पर भी नकारात्मक प्रभाव डाल रहा है। यह तथ्य भारत जैसे देश के लिए और भी चिंताजनक है, जहाँ बच्चों की आबादी बड़ी है और शहरीकरण तेजी से बढ़ रहा है।

प्रदूषित हवा में पीएम2.5, पीएम10, नाइट्रोजन डाइऑक्साइड, सल्फर डाइऑक्साइड और ओज़ोन जैसे हानिकारक तत्व शामिल होते हैं। ये सूक्ष्म कण इतने छोटे होते हैं कि सांस के साथ शरीर में प्रवेश कर रक्त प्रवाह और मस्तिष्क तक पहुँच सकते हैं। बच्चों पर इन प्रदूषकों का असर वयस्कों की तुलना में अधिक गंभीर होता है।

वायु प्रदूषण और बच्चों का मस्तिष्क विकास

विशेषज्ञों के अनुसार, छोटे- छोटे प्रदूषक कण दिमाग में सूजन (Neuro-inflammation) पैदा कर सकते हैं। इससे मस्तिष्क के विकास की रफ्तार धीमी हो सकती है, न्यूरॉन्स के संचार पर भी असर पड़ सकता है जो हमारे सीखने और निर्णय लेने की क्षमता पर असर डाल सकते हैं। इतना ही नहीं गर्भावस्था के दौरान यदि माँ प्रदूषित वातावरण में रहती है, तो इसका असर गर्भ में पल रहे बच्चे के मानसिक विकास पर भी पड़ सकता है।

The Lancet Planetary Health में प्रकाशित एक अंतरराष्ट्रीय अध्ययन के अनुसार, अधिक प्रदूषण वाले क्षेत्रों में रहने वाले बच्चों में संज्ञानात्मक क्षमताएँ (Cognitive Functions) कमजोर पाई गईं और औसतन उनके आईक्यू स्तर में गिरावट देखी गई। भारतीय संदर्भ में, इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च (ICMR) और AIIMS से जुड़े अध्ययनों में यह पाया गया है कि लंबे समय तक पीएम2.5 के संपर्क में रहने से बच्चों में ध्यान की कमी (Attention Deficit), याददाश्त कमजोर होना और सीखने की क्षमता प्रभावित हो सकती है।

European Environment Agency ने साल 2025 में अपनी एक रिपोर्ट में कुछ अध्ययनों का हवाला देते हुए जिक्र किया है कि वायु प्रदूषण और मानसिक बीमारियों के बीच एक संबंध है। प्रदूषण की वजह से डिप्रेशन और सोचने-समझने की क्षमता में कमी खास तौर पर हो सकती है, साथ ही खुद को नुकसान पहुंचाना, आत्महत्या, एंग्जायटी समेत अन्य जोखिम भी हैं। बच्चों और युवाओं का विकासशील दिमाग हवा में प्रदूषण के प्रति ज़्यादा संवेदनशील होता है, जिसके मानसिक स्वास्थ्य पर गंभीर परिणाम हो सकते हैं।

विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) की माने तो प्रदूषण की वजह से भारत में रहने वालों की औसत आयु घटती जा रही है। अनुमानित तौर पर वायु प्रदूषण भारत में सालाना 20 लाख से ज़्यादा लोगों की मौत का कारण बनता जा रहा है। देश में वायु प्रदूषण के कारण होने वाली मौतों का आंकड़ा पिछले तीस सालों में 60 फ़ीसदी तक बढ़ चुका है।

वायु प्रदूषण का सबसे ज्यादा असर अस्थमा, ब्रोंकाइटिस, एलर्जी, श्वसन रोग से प्रभावित मरीज, बच्चों या फिर फील्ड जॉब करने वालों पर होता है। मौसम में बदलाव से होने वाली समस्याओं या साँस की तकलीफ़ों से निपटने के लिए यह ज़रूरी है कि शुरूआत में ही डॉक्टर से संपर्क किया जाए। उनके सुझाव पर दवाइयां, इनहेलर (पंप) या रोटाकैप ज़रूर ख़रीदें और इसका इस्तेमाल भी ज़रूर करें ।

इस बारे में और अधिक जानने के लिए

उजाला सिग्नस ब्राइटस्टार अस्पताल, मुरादाबाद के पल्मोनोलॅजिस्ट डॉक्टर दीपक शर्मा से हमने बातचीत की है। वायु प्रदूषण हमारे स्वास्थ्य को कैसे प्रभावित करता है ?

वायु प्रदूषण आज कल के सीजन में काफ़ी बढ़ता जा रहा है। यह हमारे स्वास्थ्य को कई तरह से प्रभावित करता है। सबसे पहले तो प्रदूषण की वजह से श्वसन संबंधी समस्याएं(रेसपरिटरी इश्यूज) आती हैं। अगर बच्चों में रेसपरिटरी इश्यूज होते हैं तो उनके बड़े होने पर भी यह समस्या बरकरार रहने की संभावना रहती है। इसके अलावा आँखों में खुजली होना, छाती का भारीपन, गले और नाक में खुजली होना, साँस लेने में दिक़्क़त होना, क्रोनिक कफ या अस्थमा जैसी समस्याएं होने लगती हैं। बहुत सारे मरीजों में देखा गया है कि वायु प्रदूषण की वजह से हार्ट अटैक, स्ट्रोक या लंग कैंसर की संभावनाएँ भी बढ़ जाती है। न्यूरोलॉजिकल इश्यू जैसे डिप्रेशन, चक्कर आना, एन्जाइटी, काम में मन नहीं लगना, जैसी समस्याएँ भी वायु प्रदूषण की वजह से होता है।

क्या इससे बच्चों के फेफड़े और इम्युनिटी प्रभावित होते हैं ?

वैसे तो वायु प्रदूषण का असर सभी आयु वर्ग के लोगों पर होता है लेकिन बच्चे इससे विशेष रूप से प्रभावित होते हैं। प्रदूषण की वजह से बच्चों के फेफेड़ों की कार्यक्षमता घटने लगती है। वे ह्रदय और श्वास से जुड़ी बीमारियों के कम उम्र में ही शिकार होने लगते हैं। बच्चों में अस्थमा, ब्रोंकाइटिस, निमोनिया जैसी बीमारियां भी वायु प्रदूषण से जुड़ी हुई है। यह बच्चों के शारीरिक विकास को भी प्रभावित करता है।

क्या वायु प्रदूषण बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य को भी प्रभावित करता है ?

बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य पर वायु प्रदूषण का बहुत बुरा असर होता है। कई वैश्विक शोध में देखा गया है कि जो बच्चे अधिक प्रदूषित क्षेत्र या शहरों में रहते हैं, दूसरे बच्चों की तुलना में उनका आईक्यू हमेशा कम होता है। इन बच्चों के व्यवहारिक और मानसिक विकास पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।

वायु प्रदूषण से बचाव में क्या मास्क कारगर है ? हमें क्या एहतियात बरतनी चाहिए ?

हां, वायु प्रदूषण से बचाव में मास्क कारगर होता है। इसलिए जब कभी घर से निकले या मार्केट एरिया में जाएँ तो मास्क ज़रूर पहनना चाहिये। प्रदूषण के स्तर के मुताबिक बाजार में मास्क के कई विकल्प मौजूद हैं। जैसे सिंपल फ़ेस मास्क, एन 95 मास्क और HEPA फ़िल्टर मास्क( high efficiency particulate air(filter) होते हैं। अमूमन सभी को बाहर निकलते समय साधारण मास्क तो ज़रूर इस्तेमाल करना चाहिंए। लेकिन एन 95 मास्क भी प्रयोग कर सकते हैं। ख़ासतौर पर सर्दियों के मौसम में जब वातावरण में स्मोक बहुत ज़्यादा होता है एन 95 मास्क का इस्तेमाल ज़रूर करें। जो लोग अत्याधिक प्रदूषित क्षेत्र या केमिकल इंडस्ट्रीज़ में काम करते हैं जहां फ़्यूल एक्सपोज़र ज़्यादा रहता है उनके लिए Respirator with HEPA filter mask लगाना ज़्यादा बेहतर होता है। से सभी मास्क आजकल बाजार में आसानी से उपलब्ध हैं।

क्या वायु प्रदूषण भारत में मृत्यु दर बढ़ाने में विशेष योगदान दे रहा है ?

दुनिया के सबसे प्रदूषित देशों में शुमार भारत लंबे समय से वायु प्रदूषण के उच्च स्तर को झेल रहा है। यह देश में हर साल लाखों अकाल मौतों के लिए जिम्मेदार है। यह बिल्कुल सही है कि वायु प्रदूषण से मृत्यु दर बढ़ जाती है। अधिक प्रदूषित क्षेत्रों में हार्ट अटैक, स्ट्रोक या लंग कैंसर की संभावना कई गुना बढ़ जाती है। कई स्टडीज़ में यह भी देखा गया है कि हाई पॉल्युटेंट एरिया में रहने वाली गर्भवती महिलाओं के मिस कैरेज या स्टील बर्थ की संभावना बढ़ जाती है। ऐसा भी देखा गया है कि प्रदूषण की वजह से न्यूरोलॉजिकल मामले जैसे चिड़चिड़ापन, डिप्रेशन, डिजीनेस, एन्जाइटी या लैक आफ अटेंशन के मामले ज्यादा आते हैं।

क्या वायु प्रदूषण से बचने के लिए खान -पान या जीवनशैली में बदलाव कारगर है ?

संतुलित भोजन और स्वस्थ जीवनशैली अधिकांश रोगों से बचाव में कारगर होता है। हमें अपने भोजन का चयन काफी सोच कर करना चाहिए। हमें दुग्ध व पशु उत्पादों के उपयोग से बचना चाहिए। इससे एमिशन रेट काफ़ी कम हो जाता है। पौधों से मिलने वाले उत्पाद जैसे आँवला, हल्दी या ब्रोकली, ये काफ़ी असरदार होते हैं। वायु प्रदूषण को नियंत्रित करने, इम्युनिटी बढ़ाने और एंटी इंफ्लामेंट्री भी यह काफ़ी अच्छा काम करते हैं।

क्या वायु प्रदूषण से निपटने में एयर प्युरीफायर कारगर है ? क्या इससे हमारी इम्युनिटी पर असर पड़ता

है ?

वायु प्रदूषण से बचने के लिए एयर प्युरीफ़ायर का इस्तेमाल ज़रूर करना चाहिए। यह बहुत कारगर होता है। दरअसल एयर प्युरीफ़ायर में HEPA फ़िल्टर होता है जो कि एक उच्च गुणवत्ता वाला एयर फ़िल्टर है। यह 99 फीसदी इनडोर एयर पॉल्युशन (धुल-कण) को कम कर हवा में ताजगी लाता है। इसलिए कम से कम रात में सोते समय और संभव हो तो दिन में भी एयर प्युरीफ़ायर का उपयोग करें। एयर प्युरीफ़ायर कभी भी इम्युनिटी को प्रभावित नहीं करते हैं। यह महज एक मिथक है। इसलिए घर में छोटे हो या बड़े सभी इसका इस्तेमाल कर सकते हैं।

वायु प्रदूषण और हमारा स्वास्थ्य विषय से जुड़ा कोई सवाल अगर आपके पास भी है तो आप आज ही अपने नजदीकी उजाला सिग्नसहॉस्पिटलजाकर डॉक्टर से परामर्श ले सकते हैं या फिर हमारे स्वास्थ्य विशेषज्ञों से askadoctor@ujalacygnus.com पर ईमेल के जरिए पूछ सकते हैं।

FAQ

क्या N95 मास्क का इस्तेमाल कई दफा किया जा सकता है ?

वायु प्रदूषण से बचने के लिए घर से बाहर निकलते समय N95 मास्क का इस्तेमाल ज़रूर करना चाहिए। यह भी ज़रूरी है कि इन मास्क को तय समय पर बदल दिया जाए। ऐसा नहीं है कि एक N95 मास्क का उपयोग महीनों तक किया जा सकता है। एक N95 मास्क का इस्तेमाल अधिकतम पाँच बार ही करना चाहिए।

वायु प्रदूषण से बचने के लिए किस तरह का एयर प्यूरीफायर खरीदना चाहिए ?

घर या दफ़्तर में लगने वाले एयर प्यूरीफायर के लिए यह सुनिश्चित करना चाहिए कि यह कार्बन फ़िल्टर आधारित हो और जिससे ओज़ोन नहीं निकले। एयर प्युरीफ़ायर में HEPA फ़िल्टर लगा होता है जो कि एक उच्च गुणवत्ता वाला एयर फ़िल्टर है। यह 99 फीसदी इनडोर एयर पॉल्युशन (धुल-कण) को कम करता है और हवा में ताजगी लाता है। इसलिए कम से कम रात में सोते समय और संभव हो तो दिन में भी एयर प्युरीफ़ायर का उपयोग करें। एयर प्युरीफ़ायर से कभी भी इम्युनिटी प्रभावित नहीं होती है।

क्या वायु प्रदूषण से बचाव के लिए कोई टीका उपलब्ध है?

अगर आप पहले से ही किसी बीमारी से ग्रस्त हैं तो अपने डॉक्टर से निमोनिया या फ़्लू के टीके लेने के बारे में जानकारी लें। दरअसल वायु प्रदूषण की वजह से फेफड़ों के संक्रमण का ख़तरा बना रहता है। इससे बचने में यह टीके कारगर साबित हो सकते हैं।

हम किन तरीकों से वायु प्रदूषण को नियंत्रित करने में मदद कर सकते हैं?

प्राकृतिक गैस व जैव ईंधन को प्रोत्साहित करें। भोजन व गाड़ियों के परिचालन के लिये जहां तक हो सके स्वच्छ ईंधन का ही इस्तेमाल करें। ज्यादा से ज्यादा पौधे लगाने में मदद करें।

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