चुपचाप सहने से लेकर मज़बूत सेहत तक: भारत में महिलाओं के स्वास्थ्य पर सोचना है जरूरी

अक्सर देखा जाता है कि महिलाओं के स्वास्थ्य पर उनकी प्रेग्नेंसी और बच्चे के जन्म के समय ही बात होती है। जबकि उनकी देखभाल उम्र के सभी पड़ाव में काफी ज़रूरी है— टीनएज से लेकर बच्चे पैदा करने, मेनोपॉज़ और उसके बाद तक। उत्तर भारत के टियर-2 और टियर-3 शहरों में अपने काम में, मैंने बार-बार एक हैरान करने वाला पैटर्न देखा है। महिलाएं अक्सर परिवार की आखिरी सदस्य होती हैं जो स्वास्थ्य सुविधाओं को लेती हैं। सामाजिक भेदभाव, आर्थिक निर्भरता और जागरूकता के अभाव में महिलाएं सालों तक चुपचाप स्वास्थ्य समस्याओं को झेलती रहती हैं।

इसके नतीजे बहुत गंभीर होते हैं। ऐसी बीमारियां जिन्हें आसानी से रोका जा सकता है या जिनका इलाज किया जा सकता है, उनका पता समय रहते नहीं लग पता — जैसे एनीमिया, सर्वाइकल कैंसर, ऑस्टियोपोरोसिस, या डायबिटीज़। यही वजह है कि प्रत्येक दस में से एक महिला को इनका पता एडवांस स्टेज में लगता है। इसलिए महिलाओं के स्वास्थ्य को बेहतर बनाने के लिए न सिर्फ़ क्लिनिकल इलाज की ज़रूरत है, बल्कि जागरूकता, सशक्तिकरण और प्रिवेंटिव हेल्थकेयर सिस्टम की भी ज़रूरत है जो महिलाओं तक आसानी से पहुंचनी चाहिए।

महिलाओं की हेल्थ से जुड़ी चुनौतियों का बोझ

भारत ने पिछले कुछ दशकों में स्वास्थ्य सेवा के क्षेत्र में बहुत तरक्की की है। लेकिन, महिलाओं को अभी भी कई खास स्वास्थ्य चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है।

एनीमिया – भारत की साइलेंट एपिडेमिक

भारत में महिलाओं में सबसे आम स्वास्थ्य समस्याओं में से एक आयरन की कमी से होने वाला एनीमिया है। नेशनल हेल्थ सर्वे के मुताबिक, भारत में रिप्रोडक्टिव उम्र की आधी से ज़्यादा महिलाएं एनीमिया से पीड़ित हैं। एनीमिया से थकान, इम्यूनिटी कम होना, प्रेग्नेंसी में दिक्कतें, और सोचने-समझने की क्षमता और फिजिकल परफॉर्मेंस पर असर पड़ता है।

एनीमिया को काफी हद तक इन तरीकों से रोका जा सकता है:

  • संतुलित न्यूट्रिशन
  • आयरन सप्लीमेंटेशन
  • रेगुलर हेल्थ स्क्रीनिंग
  • खाने-पीने के तरीकों के बारे में जागरूकता
  • लेकिन दुख की बात यह है कि स्वास्थ्य के प्रति जागरुकता की कमी और सामाजिक रुकावटों की वजह से कई महिलाओं में इसका पता नहीं चल पाता है।

ब्रेस्ट और सर्वाइकल कैंसर

दुनिया भर में महिलाओं की हेल्थ के लिए दो सबसे बड़े खतरे ब्रेस्ट कैंसर और सर्वाइकल कैंसर हैं। सर्वाइकल कैंसर खास तौर पर इन तरीकों से लगभग पूरी तरह से रोका जा सकता है:

  • HPV वैक्सीनेशन
  • पैप स्मीयर या HPV टेस्टिंग के ज़रिए रेगुलर स्क्रीनिंग
  • कैंसर से पहले के घावों का जल्दी इलाज
  • इसी तरह ब्रेस्ट कैंसर के बचने की दर जल्दी पता चलने और समय पर इलाज से काफी बेहतर हो सकती है। लेकिन यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि बदनामी, डर और स्क्रीनिंग इंफ्रास्ट्रक्चर की कमी की वजह से महिलाओं को बीमारी के एडवांस स्टेज में इसका पता चल पाता है और उन्हें मेडिकल मदद मिल पाती है।

रिप्रोडक्टिव हेल्थ डिसऑर्डर

  • कई महिलाएं चुपचाप रिप्रोडक्टिव हेल्थ प्रॉब्लम से परेशान रहती हैं, जैसे:
  • पॉलीसिस्टिक ओवरी सिंड्रोम (PCOS)
  • एंडोमेट्रियोसिस
  • पीरियड्स से जुड़ी बीमारियां
  • इनफर्टिलिटी
  • खास तौर पर युवा लड़कियों के लिए, पीरियड्स हेल्थ के बारे में जानकारी की कमी अक्सर कन्फ्यूजन और बदनामी का कारण बनती है। शिक्षा और खुली बातचीत के ज़रिए इन टैबू को तोड़ना बहुत ज़रूरी है।

महिलाओं में लाइफस्टाइल से जुड़ी बीमारियों का बढ़ना

महिलाओं की हेल्थ में एक और बड़ा बदलाव नॉन-कम्युनिकेबल बीमारियों का बढ़ना है। शहरीकरण, आराम वाली लाइफस्टाइल और खान-पान में बदलाव की वजह से ये बीमारिया बढ़ गई है:

  • डायबिटीज
  • हाइपरटेंशन
  • थायरॉइड
  • मोटापा
  • कार्डियोवैस्कुलर बीमारी

पहले दिल की बीमारी को पुरुषों की बीमारी माना जाता था, लेकिन अब यह दुनिया भर में महिलाओं में मौत के मुख्य कारणों में से एक है। समस्या और भी बढ़ जाती है, क्योंकि महिलाओं में लक्षण अक्सर थोड़े अलग होते हैं और इसलिए उनका पता नहीं चल पाता।

महिलाएं हेल्थकेयर लेने में देरी क्यों करती हैं

महिलाओं के लिए हेल्थ केयर में आने वाली रुकावटों को समझना और असरदार समाधान निकालना ज़रूरी है। कई घरों में, महिलाएं अपनी सेहत से ज़्यादा अपने बच्चों और परिवार की ज़रूरतों को प्राथमिकता देती हैं। महिलाएं मेडिकल सलाह में देरी करने के आम कारणों में शामिल हैं:

  • परिवार के दूसरे सदस्यों पर पैसे की निर्भरता
  • रिप्रोडक्टिव हेल्थ को लेकर सामाजिक भेदभाव
  • आस-पास हेल्थकेयर सुविधाओं की कमी
  • प्रिवेंटिव हेल्थ के बारे में कम जानकारी
  • महिलाओं की हेल्थ से जुड़ी समस्याओं पर खुलकर बात करने से रोकने वाले कल्चरल नियम
  • इन वजहों से, कई महिलाएं हॉस्पिटल तभी पहुंचती हैं जब बीमारी काफी बढ़ चुकी होती है।

प्रिवेंटिव हेल्थकेयर: सबसे पावरफुल टूल

महिलाओं की हेल्थ को बेहतर बनाने का सबसे असरदार तरीका है रोकथाम और बीमारी का जल्दी पता लगाना। महिलाओं को रेगुलर स्क्रीनिंग और हेल्दी लाइफस्टाइल की आदतों के ज़रिए स्वास्थ्य के प्रति सजग रहने के लिए बढ़ावा देना चाहिए।

इनमें शामिल हैं:

  • 30 साल की उम्र के बाद सालाना हेल्थ चेक-अप
  • सर्वाइकल कैंसर स्क्रीनिंग
  • ज़रूरत पड़ने पर ब्रेस्ट सेल्फ-एग्जामिनेशन और मैमोग्राफी
  • ब्लड प्रेशर और ब्लड शुगर लेवल की मॉनिटरिंग
  • मेनोपॉज़ के बाद बोन डेंसिटी टेस्टिंग

प्रिवेंटिव हेल्थकेयर न सिर्फ़ जान बचाता है बल्कि परिवारों पर आर्थिक बोझ भी कम करता है। यहाँ उल्लेखनीय है कि स्वस्थ नारी, सशक्त परिवार अभियान के विज़न को सपोर्ट करते हुए परिवार और समाज की भलाई में महिलाओं की अहम भूमिका को पहचानते हुए, भारत सरकार ने भी “स्वस्थ नारी, सशक्त परिवार” के विचार को बढ़ावा दिया है — एक स्वस्थ महिला ही एक सशक्त परिवार को तैयार करती है।

यह सोच

उजाला सिग्नस हॉस्पिटल

नेटवर्क में हमारे काम के साथ गहराई से जुड़ी है, जो छोटे शहरों और सेमी-अर्बन इलाकों में रहने वाले समुदायों को सेवा देता है, जहाँ बेहतर स्वास्थ्य सेवा तक पहुँच ऐतिहासिक रूप से सीमित रही है। ‘सेहत चौपाल’, स्वास्थ्य जागरूकता शिविर और प्रिवेंटिव स्क्रिनिंग प्रोग्राम जैसी सामुदायिक पहलों के माध्यम से हम महिलाओं तक स्वास्थ्य सेवा पहुँचाने का काम कर रहे हैं।

हमारी पहलों का मुख्य उद्देश्य है:

  • महिलाओं और किशोरियों के लिए एनीमिया की जाँच और पोषण संबंधी जागरूकता
  • छोटे शहरों में स्तन और सर्वाइकल कैंसर की जाँच के लिए शिविर
  • मातृ स्वास्थ्य जागरूकता और सुरक्षित गर्भावस्था के बारे में शिक्षा
  • मधुमेह और उच्च रक्तचाप जैसी जीवनशैली से जुड़ी बीमारियों की जाँच
  • स्वास्थ्य साक्षरता कार्यक्रम, जो परिवारों को महिलाओं के स्वास्थ्य को प्राथमिकता देने के लिए प्रेरित करते हैं
  • ये सभी पहल उस राष्ट्रीय दृष्टिकोण को मज़बूत करती हैं कि महिलाओं को ज्ञान और स्वास्थ्य सेवा तक पहुँच देकर सशक्त बनाने से स्वस्थ परिवार और मज़बूत समुदाय बनते हैं।
  • जीवनशैली से जुड़े ऐसे चुनाव जो महिलाओं के स्वास्थ्य को बेहतर बनाते हैं
  • चिकित्सा देखभाल के अलावा, रोज़मर्रा की जीवनशैली से जुड़े चुनाव भी महिलाओं के स्वास्थ्य में अहम भूमिका निभाते हैं।

संतुलित पोषण:

महिलाओं को इन चीज़ों की पर्याप्त मात्रा की ज़रूरत होती है:

  • आयरन
  • कैल्शियम
  • प्रोटीन
  • विटामिन और सूक्ष्म पोषक तत्व

सब्ज़ियों, फलों, दालों, डेयरी उत्पादों, मेवा और साबुत अनाज से भरपूर आहार कई तरह की कमियों को दूर कर सकता है।

शारीरिक गतिविधि:

नियमित व्यायाम से मोटापा, मधुमेह, हृदय रोग और डिप्रेशन का जोखिम कम करने में मदद मिलती है। रोज़ाना सिर्फ़ 30 मिनट तेज़ चलना भी स्वास्थ्य परिणामों में काफ़ी सुधार ला सकता है।

मानसिक स्वास्थ्य और तनाव प्रबंधन

महिलाएँ अक्सर कई तरह की ज़िम्मेदारियों को एक साथ निभाती हैं — पेशेवर काम, बच्चों की देखभाल करना और घर के काम-काज। लगातार तनाव रहने से चिंता, नींद में गड़बड़ी और मानसिक थकावट हो सकती है। मानसिक स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता बढ़ाना और अपनी देखभाल को प्राथमिकता देना बहुत ज़रूरी है।

  • कार्रवाई के लिए एक आह्वान
  • महिलाओं के स्वास्थ्य को बेहतर बनाने के लिए स्वास्थ्य सेवा प्रदाताओं, नीति निर्माताओं, समुदायों और परिवारों के बीच आपसी सहयोग की ज़रूरत है।
  • हमें इन लक्ष्यों को पाने की दिशा में काम करना चाहिए:
  • प्रिवेंटिव हेल्थ के बारे में जागरूकता
  • छोटे शहरों में आसानी से उपलब्ध जाँच कार्यक्रम
  • किफ़ायती स्वास्थ्य सेवाएँ
  • महिलाओं को अपने स्वास्थ्य को प्राथमिकता देने के लिए सशक्त बनाना

महिलाएँ परिवारों और समुदायों की रीढ़ होती हैं। जब महिलाएँ स्वस्थ होती हैं, तो पूरा समाज फलता-फूलता है। इसलिए, महिलाओं की स्वास्थ्य देखभाल न केवल एक चिकित्सकीय प्राथमिकता है, बल्कि एक सामाजिक और आर्थिक अनिवार्यता भी है। महिलाओं के बेहतर स्वास्थ्य की दिशा में सफ़र जागरूकता से शुरू होता है, लेकिन अंततः इसे ठोस कार्रवाई में बदलना होगा। हर महिला बेहतर स्वास्थ्य सेवा तक पहुँच, स्वास्थ्य से जुड़े सही फ़ैसले लेने के लिए ज़रूरी जानकारी और अपने स्वास्थ्य को प्राथमिकता देने में समाज के सहयोग की हक़दार है। अगर हम चुपचाप तकलीफ़ सहने की संस्कृति से निकलकर जागरूकता, रोकथाम और सशक्तिकरण की संस्कृति की ओर बढ़ सकें, तो हम ज़्यादा सेहतमंद परिवार, ज़्यादा मज़बूत समुदाय और ज़्यादा न्यायसंगत भविष्य का निर्माण कर पाएँगे।

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