गर्भावस्था में डायबिटीज़ को न करें नजरअंदाज, हो सकते हैं गंभीर परिणाम

गर्भावस्था के दौरान महिलाओं के शरीर में अक्सर ब्लड शुगर की मात्रा बढ़ जाती है जो कि माँ और बच्चे, दोनों के स्वास्थ्य के लिए खतरनाक हो सकता है। इसे जेस्टेशनल डायबिटीज़ मेलिटस (GDM) कहते हैं। यह भारत में गर्भावस्था के दौरान स्वास्थ्य से जुड़ी एक बड़ी चिंता का विषय है। यह समस्या हर साल लाखों महिलाओं को प्रभावित करती है। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक गर्भावस्था के दौरान डायबिटीज शहरी इलाकों में करीब 42% महिलाओं को प्रभावित करती है।

यदि किसी महिला को GDM हो जाता है, तो उसे भविष्य में टाइप 2 डायबिटीज़ होने की संभावना रहती है। साथ ही हाई ब्लड प्रेशर, प्रीक्लेम्पसिया, संक्रमण का खतरा, सी-सेक्शन डिलीवरी जैसी समस्याएं भी आ सकती हैं। वहीं बच्चे का वज़न जन्म के समय ज़्यादा हो सकता है (मैक्रोसोमिया), उसे सांस लेने में तकलीफ, भविष्य में उसे भी टाइप 2 डायबिटीज़ और कई तरह की जन्मजात बीमारियों के होने का खतरा रहता है।

दरअसल GDM गर्भावस्था के दौरान तब होता है, जब किसी महिला का शरीर बढ़ी हुई ज़रूरतों को पूरा करने के लिए पर्याप्त इंसुलिन नहीं बना पाता। इसके परिणामस्वरूप, उसका ब्लड शुगर लेवल बढ़ जाता है, जो माँ और बच्चे, दोनों के स्वास्थ्य को प्रभावित करता है। इसलिए गर्भावस्था के दौरान नियंत्रित रखना जरूरी है।

शहरी इलाकों में GDM के बढ़ने का कारण बदलती जीवनशैली, प्रोसेस्ड फ़ूड का बढ़ता सेवन, कम फ़ाइबर वाला आहार, वसा का अत्याधिक सेवन और इंसुलिन प्रतिरोध मुख्य रूप से हैं। इसके अलावा GDM निम्न सामाजिक-आर्थिक स्थिति, खान-पान की आदत, स्वास्थ्य सेवाओं की सीमित पहुँच और मोटापे से भी जुड़ी हुई है। विशेषज्ञों के मुतिबक अधिक उम्र में गर्भधारण भी GDM के जोखिम को बढ़ा सकती है। लेकिन स्वस्थ आहार, नियमित व्यायाम, वज़न नियंत्रण और ब्लड शुगर लेवल की नियमित जांच के जरिए GDM को नियंत्रित किया जा सकता है। GDM को नियंत्रित करने के लिए अगर आहार और व्यायाम पर्याप्त नहीं हैं, तो ब्लड शुगर लेवल को कम करने के लिए इंसुलिन के इंजेक्शन आवश्यक हो सकते हैं। डॉ. जसप्रीत सिंह (कंसल्टेंट एंडोक्रिनोलॉजी, उजाला सिग्नस ) ने जेस्टेशनल डायबिटीज़ मेलिटस से जुड़े ज़रूरी सवालों के जवाब दिए हैं।

प्रेग्नेंसी के दौरान डायबिटीज़ (जेस्टेशनल डायबिटीज़) क्यों होती है ?

जेस्टेशनल डायबिटीज़ प्रेग्नेंसी के दौरान होने वाले हार्मोनल बदलावों की वजह से होती है। प्लेसेंटा हार्मोन बनाता है। उदाहरण के लिए, ह्यूमन प्लेसेंटल लैक्टोजेन और प्रोजेस्टोजन इंसुलिन रेजिस्टेंस पैदा कर सकते हैं। अगर पैंक्रियाज़ उस रेजिस्टेंस को दूर करने के लिए काफ़ी इंसुलिन नहीं बना पाता, तो ब्लड शुगर लेवल बढ़ जाता है, जिससे GDM हो जाता है।

GDM से जुड़े आम रिस्क फैक्टर क्या हैं ?

आम रिस्क फैक्टर हैं मोटापा, डायबिटीज़ की फैमिली हिस्ट्री, पिछली प्रेग्नेंसी में जेस्टेशनल डायबिटीज़ होना (जिसमें पॉलीसिस्टिक ओवरी सिंड्रोम भी हो सकता है), और 4 किलो से ज़्यादा वज़न वाले बच्चे को जन्म देने की हिस्ट्री।

जेस्टेशनल डायबिटीज़ से कैसे बचा जा सकता है, और इसका पता कैसे चलता है ?

जेस्टेशनल डायबिटीज़ का खतरा कम करने के लिए, महिलाओं को अपना वज़न नियंत्रित रखना चाहिए। प्रेग्नेंसी से पहले और उसके दौरान बहुत ज़्यादा वज़न बढ़ने से बचें। रेगुलर एक्सरसाइज़ करें, चलने जैसी हल्की-फुल्की एक्टिविटीज़ में हिस्सा लें, और बैलेंस्ड डाइट लें। उन्हें कम ग्लाइसेमिक इंडेक्स वाले फूड्स (जैसे साबुत अनाज) खाना चाहिए, मीठे और प्रोसेस्ड फूड्स का सेवन कम करना चाहिए, डाइट में काफ़ी फाइबर और प्रोटीन शामिल करना चाहिए, और रेगुलर स्क्रीनिंग ज़रूर करवानी चाहिए। डॉक्टर की सलाह के मुताबिक अपने ब्लड शुगर लेवल पर नज़र रखें। भविष्य में डायबिटीज़ से बचने के लिए, हेल्दी डाइट लें, रेगुलर एक्सरसाइज़ करें, और प्रेग्नेंसी के बाद ग्लूकोज़ लेवल पर नज़र रखने के लिए फॉलो-अप अपॉइंटमेंट लें। जेस्टेशनल डायबिटीज़ का पता लगाने के लिए ओरल ग्लूकोज़ टॉलरेंस टेस्ट किया जाता है, जो आमतौर पर प्रेग्नेंसी के 24 से 28 हफ़्तों के बीच किया जाता है।

प्रेग्नेंसी के दौरान डायबिटीज़ होने पर बच्चे पर क्या असर पड़ सकता है ?

GDM की वजह से बच्चे पर कई तरह के असर पड़ सकते हैं, जैसे मैक्रोसोमिया (जैसा कि मैंने पहले बताया, बच्चे का वज़न 4 किलो से ज़्यादा हो सकता है)। इसकी वजह से हाइपोग्लाइसीमिया हो सकता है। इसकी वजह से समय से पहले डिलीवरी हो सकती है, बच्चे में कुछ जन्मजात कमियाँ हो सकती हैं, और भविष्य में उस बच्चे को टाइप 2 डायबिटीज़ या मोटापे का खतरा भी हो सकता है।

क्या जेस्टेशनल डायबिटीज़ से हमेशा के लिए छुटकारा पाना मुश्किल है ?

जेस्टेशनल डायबिटीज़ आमतौर पर डिलीवरी के बाद ठीक हो जाती है। हालाँकि, जिन महिलाओं को यह समस्या होती है, उनमें बाद में ज़िंदगी में टाइप 2 डायबिटीज़ होने का 50 प्रतिशत खतरा होता है। अगर इसका सही इलाज न किया जाए, तो जेस्टेशनल डायबिटीज़ महिला और उसके बच्चे, दोनों के लिए समस्याएँ खड़ी कर सकती है।

अगर प्रेग्नेंसी के दौरान डायबिटीज़ हो जाए , तो क्या इसकी वजह से कोई और समस्या भी हो सकती है ?

हाँ, अनियंत्रित जेस्टेशनल डायबिटीज़ से स्वास्थ्य संबंधी अन्य समस्याएँ हो सकती हैं। जैसे प्रीक्लेम्पसिया (एक प्रकार का हाई ब्लड प्रेशर विकार जो गर्भावस्था के दौरान हो सकता है) और गर्भावस्था के दौरान किडनी की समस्याएँ। इससे समय से पहले प्रसव हो सकता है। इसके अलावा प्लेसेंटा संबंधी विकार भी हो सकता है, और इससे बाद में टाइप 2 डायबिटीज़ होने का खतरा बढ़ सकता है।

यदि GDM का सही तरीके से प्रबंधन नहीं किया जाए, तो यह माँ और शिशु दोनों के लिए एक गंभीर समस्या बन सकती है। हमेशा याद रखें कि जेस्टेशनल डायबिटीज़ का शीघ्र निदान और प्रबंधन माँ और शिशु के स्वास्थ्य के लिए अत्यंत आवश्यक है। यदि कोई महिला गर्भवती है या गर्भवती होने की योजना बना रही है, तो GDM के जोखिम कारकों के बारे में डॉक्टर से बात करना बेहतर है।

यदि आपके पास जेस्टेशनल डायबिटीज़ मेलिटस (GDM) के बारे में कोई विशेष प्रश्न हैं, तो कृपया अपने निकटतम उजाला सिग्नस अस्पताल से संपर्क करें। आप हमारे स्वास्थ्य विशेषज्ञों से askadoctor@ujalacygnus.com पर भी संपर्क कर सकते हैं या डॉ. जसप्रीत सिंह के साथ अपॉइंटमेंट बुक करने के लिए यहाँ क्लिक करें।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

यदि GDM का ठीक से उपचार नहीं किया जाए, तो माँ के लिए क्या जोखिम हैं?

यदि GDM का ठीक से उपचार नहीं किया जाए, तो माँ के लिए कई जोखिम कारक होते हैं। जैसे भविष्य में टाइप 2 डायबिटीज़ होने का खतरा। साथ ही हाई ब्लड प्रेशर, प्रीक्लेम्पसिया, संक्रमण का खतरा, सी-सेक्शन डिलीवरी जैसी समस्याएं भी आ सकती हैं

यदि माँ को GDM है, तो शिशु के लिए क्या जोखिम हैं?

यदि किसी महिला को GDM हो जाता है, तो उसके बच्चे के जन्म के समय वज़न ज़्यादा हो सकता है (मैक्रोसोमिया), उसे सांस लेने में दिक्कत हो सकती है, बाद में उसे टाइप 2 डायबिटीज़ हो सकती है, साथ ही कई तरह की जन्मजात बीमारियों का खतरा भी हो सकता है।

GDM से बचाव के क्या उपाय हैं?

GDM से बचने का कोई पक्का तरीका नहीं है, बस कुछ तरीके हैं जिनसे इसका खतरा कम किया जा सकता है, जैसे कि प्रेग्नेंसी से पहले और उसके दौरान अपना वज़न ठीक रखना, रेगुलर एक्सरसाइज़ करना, हेल्दी खाना खाना, रेगुलर हेल्थ चेकअप करवाना, ब्लड शुगर पर नज़र रखना और दवाइयाँ लेना

जेस्टेशनल डायबिटीज़ मेलिटस (GDM) के क्या कारण हैं?

प्रेग्नेंसी के दौरान, प्लेसेंटा कुछ ऐसे हार्मोन बनाता है जो इंसुलिन के ब्लड शुगर लेवल को कंट्रोल करने की क्षमता में रुकावट डाल सकते हैं। इसका मतलब है कि हार्मोनल बदलाव, इंसुलिन रेजिस्टेंस, जेनेटिक कारण और मोटापा, ये सभी GDM का खतरा बढ़ा सकते हैं। साथ ही, शरीर इंसुलिन के प्रति कम रिस्पॉन्सिव हो सकता है, जिससे ब्लड शुगर को कंट्रोल करना और भी मुश्किल हो जाता है। अगर किसी प्रेग्नेंट महिला को बहुत ज़्यादा प्यास लगती है, बार-बार पेशाब आता है, धुंधला दिखाई देता है, थकान महसूस होती है, या भूख ज़्यादा लगती है, तो उसे डॉक्टर से सलाह लेनी चाहिए।

भारत में GDM चिंता का विषय क्यों है?

भारत में GDM एक बड़ी समस्या है, खासकर शहरी इलाकों में। इसके कई कारण हैं, जिनमें शहरीकरण भी शामिल है। शहरीकरण की वजह से लोगों की जीवनशैली में बदलाव आया है; अब लोग ज़्यादातर बैठे रहने वाला काम करते हैं और प्रोसेस्ड खाना ज़्यादा खाते हैं। ये दोनों ही GDM के बड़े खतरे हैं। ज़्यादा कैलोरी और कम फाइबर वाला खाना, जिसमें अक्सर रिफाइंड कार्बोहाइड्रेट और अनहेल्दी फैट्स ज़्यादा होते हैं, इंसुलिन रेजिस्टेंस और GDM होने का खतरा बढ़ा सकता है।

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